Monday, November 12, 2018

Fish farming

जाड़े के मौसम में मछलियों में होने वाले बीमारीयों से बचाव कैसे करें।

चूँकि मछली एक जलीय जीव है, अतएव उसके जीवन पर आस-पास के वातावरण की बदलती परिस्थतियां बहुत असरदायक हो सकती हैं। मछली के आस-पास का पर्यावरण उसके अनुकूल रहना अत्यंत आवशयक है। जाड़े के दिनों में तालाब की परिस्थति भिन्न हो जाती है तथा तापमान कम होने के कारण मछलियाँ तालाब की तली में ज्यादा समय व्यतीत करती हैं । अत: ऐसी स्थिति में ‘ऐपिजुएटिक अल्सरेटिव सिन्ड्रोम’ (EUS) नामक बीमारी होने की संभावना काफी ज्यादा बढ़ जाती है । इसे लाल चक्ते वाली बीमारी के नाम से भी जाना जाता है । यह भारतीय मेजर कॉर्प के साथ-साथ जंगली अपतृण मछलियों की भी व्यापक रूप से प्रभावित करती है। समय पर उपचार नहीं करने पर कुछ ही दिनों में पूरे पोखर की मछलियाँ संक्रमित हो जाती हैं और बड़े पैमाने पर मछलियाँ तुरंत मरने लगती हैं ।

बीमारी का इतिहास।

इस रोग का विश्लेषण करने पर यह पाया गया कि प्रारंभिक अवस्था में यह रोग फफूंदी तथा बाद में जीवाणु द्वारा फैलता है । विश्व में सर्वप्रथम यह बीमारी 1988 में बांग्लादेश में पायी गयी थी, वहाँ से भारतवर्ष में आयी ।
इस बीमारी का प्रकोप 15 दिसम्बर से जनवरी के मध्य तक ज्यादा देखा जाता है जब तापमान काफी कम हो जाता है । सबसे पहले तालाब में रहने वाली जंगली मछलियों यथा पोठिया, गरई, मांगुर, गईची आदि में यह बीमारी प्रकट होती है । अतएव जैसे ही इन मछलियों में यह बीमारी नजर आने लगे तो मत्स्यपालकों को सावधान हो जाना चाहिए । उसी समय इसकी रोकथाम कर देने से तालाब की अन्य योग्य मछलियों में इस बीमारी का फैलाव नहीं होता है ।

मछलियों को बीमारी से बचाने के उपाय।

कई राज्यों में सामान्य रूप से इस बीमारी के नहीं दिखने के बावजूद 15 दिसम्बर तक तालाब में 200 कि०ग्रा०/ एकड़ भाखरा चूना का प्रयोग कर देने से मछलियों में यह बीमारी नहीं होती है और यदि होती भी है तो इसका प्रभाव कम होता है । जनवरी के बाद वातावरण का तापमान बढ़ने पर यह स्वत: ठीक हो जाती है ।
केन्द्रीय मीठाजल जीवपालन संस्था (सिफा), भुवनेश्वर द्वारा इस रोग के उपचार हेतु एक औषधि तैयार की है जिसका व्यापारिक नाम सीफैक्स (cifax) है । एक लीटर सीफैक्स एक हेक्टेयर जलक्षेत्र के लिए पर्याप्त होता है । इसे पानी में घोल कर तालाब में छिड़काव किया जाता है । गंभीर स्थिति में प्रत्येक सात दिनों में एक बार इस दवा का छिड़काव करने से काफी हद तक इस बीमारी पर काबू पाया जा सकता है ।
घरेलू उपचार में चूना के साथ हल्दी मिलाने पर अल्सर घाव जल्दी ठीक होता है । इसके लिए 40 कि० ग्रा० चूना तथा 4 कि०ग्रा० हल्दी प्रति एकड़ की दर से मिश्रण का प्रयोग किया जाता है । मछलियों को सात दिनों तक 100 मि०ग्रा० टेरामाइसिन या सल्फाडाइजिन नामक दवा प्रति कि०ग्रा० पूरक आहार में मिला कर मछलियों को खिलाने से भी अच्छा परिणाम प्राप्त होता है । Sabhar jagoo kisaan whats up group

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Gaon Connectionमचान विधि से सब्जियों खेती कर कमाएं मुनाफा


गर्मियों में अगेती किस्म की बेल वाली सब्जियों को मचान विधि से लगाकर किसान अच्छी उपज पा सकते हैं। इनकी नर्सरी तैयार करके इनकी खेती की जा सकती है। पहले इन सब्जियों की पौध तैयार की जाती है और फिर मुख्य खेत में जड़ों को बिना नुकसान पहुंचाये रोपण किया जाता है। इन सब्जियों की पौध तैयार करने 

मचान में लौकी, खीरा, करेला जैसी बेल वाली फसलों की खेती की जा सकती है। मचान विधि से खेती करने से कई लाभ हैं। मचान में खेत में बांस या तार का जाल बनाकर सब्जियों की बेल को जमीन से ऊपर पहुंचाया जाता है। मचान का प्रयोग सब्जी उत्पादक बेल वाली सब्जियों को उगाने में करते हैं। मचान के माध्यम से किसान 90 प्रतिशत फसल को खराब होने से बचाया जा सकता है।
करेला।
मचान की खेती के रूप में सब्जी उत्पादक करेला, लौकी, खीरा, सेम जैसी फसलों की खेती की जा सकती है। बरसात के मौसम में मचान की खेती फल को खराब होने से बचाती है। फसल में यदि कोई रोग लगता है तो तो मचान के माध्यम से दवा छिड़कने में भी आसानी होती है।

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उद्यान विभाग के शाक सब्जी विभाग के संयुक्त निदेशक डॉ. एमपी यादव बताते हैं, ''मचान विधि से खेती करने से किसानों को बहुत से फायदे होते हैं, किसान अपने जि़ले के उद्यान अधिकारी से जायद मौसम की लौकी, खीरा, करेला, तरबूज जैसी बेल वाली सब्जियों की उन्नतशील बीजों को खरीद सकते हैं।
बाराबंकी जि़ले के मसौली ब्लॉक के मेढ्यिा गाँव के किसान रिंकू वर्मा पिछले कई साल से मचान विधि से ही सब्जियों की खेती करते आ रहे हैं। रिंकू वर्मा कहते हैं, ''पहले मैं जमीन पर ही सब्जी की फसलें बोता था, लेकिन जब से मचान विधि से खेती कर रहा हूं, इससे ज्यादा लाभ हो रहा है।''

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खेत की तैयारी

खेत की अन्तिम जुताई के समय 200-500 कुन्तल सड़ी-गली गोबर की खाद मिला देना चाहिए। सामान्यत: अच्छी उपज लेने के लिए प्रति हेक्टेयर 240 किग्रा यूरिया, 500 किग्रा सिगंल सुपर फास्फेट एवं 125 किग्रा म्यूरेट ऑफ पोटास की आवश्यकता पड़ती है। इसमे सिंगल सुपर फास्फेट एवं पोटास की पूरी मात्रा और युरिया की आधी मात्रा नाली बनाते समय कतार में डालते है।
लौकी।
यूरिया की चौथाई मात्रा रोपाई के 20-25 दिन बाद देकर मिट्टी चढ़ा देते है तथा चौथाई मात्रा 40 दिन बाद टापड्रेसिंग से देना चाहिए। लेकिन जब पौधों को गढढ़े में रोपते है तो प्रत्येक गढढ़े में 30.40 ग्राम यूरियाए 80.100 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट व 40.50 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटास देकर रोपाई करते है।

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पौधों की खेत में रोपाई

पौधों को मिट्टी सहित निकाल कर में शाम के समय रोपाई कर देते है। रोपाई के तुरन्त बाद पौधों की हल्की सिंचाई अवश्य कर देनी चाहिए। रोपण से 4-6 दिन पहले सिंचाई रोक कर पौधों का कठोरीकरण करना चाहिए। रोपाई के 10-15 दिन बाद हाथ से निराई करके खरपतवार साफ कर देना चाहिए और समय-समय पर निराई गुड़ाई करते रहना चाहिए। पहली गुड़ाई के बाद जड़ो के आस पास हल्की मिट्टी चढ़ानी चाहिए।

मचान बनाने की विधि

इन सब्जियों में सहारा देना अति आवश्यक होता है सहारा देने के लिए लोहे की एंगल या बांस के खम्भे से मचान बनाते है। खम्भों के ऊपरी सिरे पर तार बांध कर पौधों को मचान पर चढ़ाया जाता है। सहारा देने के लिए दो खम्भो या एंगल के बीच की दूरी दो मीटर रखते हैं लेकिन ऊंचाई फसल के अनुसार अलग-अलग होती है सामान्यता करेला और खीरा के लिए चार फीट लेकिन लौकी आदि के लिए पांच फीट रखते है ।
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कीड़ों व रोगों से बचाव कीड़ों व रोगों से बचाव

इन सब्जियों में कई प्रकार के कीड़े व रोग नुकसान पहुचाते है। इनमें मुख्यत:लाल कीड़ा, फलमक्खी, डाउनी मिल्डयू मुख्य है।लाल कीड़ा, जो फसल को शुरु की अवस्था में नुकसान पहुचाता है, को नष्ट करने के लिए इन फसलो में सुबह के समय मैलाथियान नामक दवा का दो ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बना कर पौधों एवं पौधों के आस पास की मिट्टी पर छिड़काव करना चाहिए।
चैम्पा तथा फलमक्खी से बचाव के लिए एण्डोसल्फान दो मिली लीटर दवा प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बना कर पौधों पर छिड़काव करें। चूर्णिल आसिता रोग को नियंत्रित करने के लिए कैराथेन या सल्फर नामक दवा 1.2 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी का छिड़काव करना चाहिए। रोमिल आसिता के नियंत्रण हेतु डायथेन एम-45, 1-5 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी का छिड़काव करना चाहिए। दुसरा छिड़काव 15 दिन के अन्तर पर करना चाहिए।

उपज

इस विधि द्वारा मैदानी भागो में इन सब्जियो की खेती लगभग एक महीने से लेकर डेढ़ महीने तक अगेती की जा सकती है तथा उपज एवं आमदनी भी अधिक प्राप्त की जा सकती है। इस प्रकार खेती करने से टिण्डा की 100-150 कुंतल लौकी की 450-500 कुंतल तरबूज की 300-400 कुंतल, खीरा, करेला और तोरई की 250-300 कुंतल उपज प्रति हेक्टेयर की जा सकती है।Sambhar gaavconection.com


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Saturday, November 03, 2018

बैगन की जानकारी

बैगन का जन्म स्थान भारत है यह सोलेनेसी कुल का पौधा हैं इसकी खेती सब्जी के रूप में की जाती है बैगन का प्रयोग दवा के रूप में किया जाता है सफ़ेद बैगन मदुमेह में लाभकारी है 
Wednesday, 23 Aug, 9.02 am

वैज्ञानिक तरीके से करे बैंगन की खेती

बैंगन की खेती भारत और चीन में ज्यादा की जाती है. ऊंचे पहाड़ि इलाकों को छोड़कर पुरे देश में इसकी खेती की जा सकती है. क्यों की भारत की जलवायु गर्म होती है और ये began ki kheti के लिए उपयुक्त रहती है. बैंगन की बहुत सारी किस्में होती है. में कुछ विशेष किस्मों के बारे में यहाँ पर बताउगा जो hiybird है. और अच्छा उत्पादन देने वाली होती है. पूसा hibird 5 इसमे पौधा बड़ा और अच्छी शाखाओं युक्त होता है. ये फसल 80 से 90 दिनों आ जाती है. प्रति हेक्टेयर 450 से 600 क्विंटल होती है. पूसाhibird 6 गोल फल लगते है. 85 से 90 दिनों की औसत प्रति हेक्टेयर 500 से 600 क्विंटल पूसा hibird 9 85 से 90 दिनों में फल लगते है. औसत 400 से 500 क्विंटल प्रति हेक्टेयर इसके अलावा पूसा क्रांति,पूसा भैरव,पूसा बिंदु,पूसा उत्तम ,पूसा उपकार,पूसा अंकुर, जो की प्रति हेक्टेयर 200 से 400 क्विंटल तक उत्पादन देते है. कैसे करें नर्सरी तैयार नर्सरी तैयार करने के लिए खेत की मिट्टी को अच्छे से देसी खाद् (गोबर) को मिट्टी की सतह पर बिखेर कर फिर जुताई करे. (अपने खेत की मिट्टी का परीक्षण अवश्य करावे ताकि उचित मात्रा में खाद् दे सके) जुताई होने के बाद उठी हुई क्यारियां बना ले फिर एक हेक्टेयर के लिए hibird बीज 400 ग्राम तक काफी होता है. बनी हुई क्यारियों में 1 से.मी. की गहराई में 6 से 7 सेमी. की दूरी पर बीजो को डाल दे. फिर उसे पर्याप्त मात्रा में पानी देते रहे . कब करे बुआई उसे तो इस फसल को पुरे वर्ष में सभी ऋतुओ में लगाया जा सकता है. लेकिन में आपको माह से बता देता है. नर्सरी मई जून में करने पर बुआई 1 या डेढ़ माह में यानि जून या जुलाई तक कर सकते है. जो नर्सरी नवम्बर में लगाते है उसे जनवरी में शीत लहर और पाले का प्रकोप से बचा कर लगा सकते है. जो नर्सरी फरवरी और मार्च में लगाते है उसे मार्च लास्ट और अप्रैल तक की जा सकती है. कैसे करे खेत तैयार नर्सरी में पौधे तैयार होने के बाद दूसरा महत्वपूर्ण कार्य होता है खेत को तैयार करना . मिट्टी परीक्षण करने के बाद खेत में एक हेक्टेयर के लिए 4 से 5 ट्रॉली पक्का हुआ गोबर का खाद् बिखेर दे.उसके बाद 2 बेग यूरिया 3 बेग सिंगल सुपर फास्फेट और पोटेशियम सल्फ़ेट की मात्रा ले कर जुताई करे. फिर खेत में 70 सेमी. की दूरी पर क्यारियां बना लीजिए अब पोधों को 60×60 सेमी. या 60×50 में पोधों की रोपाई करे. बैंगन की फसल में लगने वाले रोग नर्सरी में लगने वाले रोग आद्रगलन(डम्पिंगऑफ़) यह एक कवक है जो पोधों को बहार से निकलने से पूर्व ही ख़त्म कर देता है. और बहार निकलने के बाद भी पोधों को सूखा देता है. रोपाई केबाद लगने वाले रोग झुलसा  sabar palpalindia.com

गमले में छोटे से पौधे में पाए ढेर सारे नींबू | How to get more lemon from small plant in a Pot Our Green Planet Our Green Planet

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3 मार्च 2020